12-Nov-2010
अप्रैल 2011 में तमिलमाडु में विधान सभा चुनाव होने हैं... जहां डीएमके की ज़रूरत... कांग्रेस है... और कांग्रेस की ज़रुरत डीएमके है... लेकिन इन दोनों पार्टियों की सबसे बड़ी ज़रुरत है... एंडीमुत्थु राजा उर्फ ए राजा...
पहली वजह
वकील से नेता बने ए राजा उस द्रविड़र काझागम के छात्र नेता हुआ करते थे... जिसकी सरपरस्ती में डीएमके का उदय हुआ... डीएमके और द्रविड़र काझागम का वही रिश्ता है जो बीजेपी और आरएसएस का है.... और करुणानिधि समेत तमाम आला डीएमके नेता द्रविड़र काझागम से आए हैं... और करुणानिधि द्रविड़र काझागम से आये नेताओं को तरजीह देते हैं... यही वजह है कि वे स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद कांग्रेस को शर्मिंदा कर सकते हैं... लेकिन राजा से कुर्सी नहीं छीन सकते...

दूसरी वजह
राजा डीएमके के लिए दलित चेहरा हैं... और विधान सभा चुनावों से पहले राजा से कुर्सी छीनने का मतलब है... दलित समुदाय को नाराज़ करना... डीएमके के लिए एक दलित नेता की ज़रुरत को इसी से समझा जा सकता है कि बहुत कम अनुभव होने के बावजूद उन्हे 1999 में एनडीए सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर बनाया गया... और यूपीए की दूसरी पारी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इच्छा न होने के बावजूद एक दाग़दार डीएमके नेता... सूचना और संचार मंत्री बन गया...
 

तीसरी वजह
लोकसभा में यूपीए के पास 265 सांसद हैं जिसमें 18 डीएमके के सांसद हैं... बहुमत के लिए 272 सीटों की ज़रुरत है और यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन देनेवाली पार्टियों को मिलाकर 320 सांसदों का साथ है... ज़ाहिर है अगर डीएमके अपना समर्थन वापस लेती है तो भी यूपीए सरकार पर फर्क नहीं पड़ेगा... लेकिन ये गणित लोकसभा में सरकार को कमज़ोर करता है... क्योंकि सपा, आरजेडी और बसपा पर भरोसा करना कांग्रेस के लिए मुश्किल है...
 

चौथी वजह
केंद्र की कांग्रेस सरकार को भले ही डीएमके के जाने से फर्क न पड़े... लेकिन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को सत्ता में रहने के लिए डीएमके के साथ रहना है... और अपना ये गठबंधन कांग्रेस तोड़ना नहीं चाहती... हालांकि राजा के मसले पर समझौता कर कांग्रेस इसे विधानसभा चुनावों में एक मौके की तरह भुना सकती है जब वो डीएमके से सीटों के बंटवारे को लेकर दबाव बना सकती है...
 

पांचवीं वजह
विपक्ष का आरोप है कि स्पेक्ट्रम घोटाले में डीएमके सुप्रीमो के परिवार को बड़ा फायदा पहुंचाया गया है... और अगर राजा कुर्सी नहीं छोड़ना चाहते... तो डीएमके सुप्रीमो न चाहते हुए भी उनसे ऐसा करने को नहीं कह सकते...

वैसे भी गठबंधन धर्म के मुताबिक प्रधानमंत्री सीधे तौर पर राजा से कुर्सी नहीं छीन सकते... लेकिन कैबिनेट में उनका विभाग बदला जा सकता है... लेकिन इसके लिए भी डीएमके सुप्रीमो करुणानिधि की मज़ूरी चाहिए होगी... जो शायद समझौते के मूड में कतई नहीं हैं।

निवेदन

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